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शालिग्राम

आप सभी जानते हैं कि भारत भूमि ऋषियों मुनियों की भूमि रही है | हिन्दू संस्कृति बहुत ही दुर्लभ संस्कृति है इसलिए बहुत ही दुर्लभ वस्तुएं देवी देवताओं के अवतार के रूप में हमें इस भूमि पर मिली हैं | यह हम सबका परम सौभाग्य है कि एैसी ही एक वस्तु शालिग्राम शिला के रूप में भगवान विष्णु के दस अवतारों के स्वरुप में हमें मिली है |

शास्त्रों के मुताबिक भगवान विष्णु के साक्षात स्वरुप में शालिग्राम शिला के बारे में सबसे प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की दोनों पत्नियों माँ सरस्वती एवं माँ लक्ष्मी जी में एक समय झगड़ा हो गया | इस झगड़े के फलस्वरूप माँ सरस्वती के श्राप के कारण से माँ लक्ष्मी जी तुलसी के रूप में सदा के लिए इस पृथ्वी पर विराजमान हो गई | भगवान विष्णु महालक्ष्मी को वापस स्वर्ग में ले जाने के लिए गण्डकी नदी में शिला के रूप में इंतज़ार करते रहे और जल में बहने के कारण से भगवान विष्णु के दसों अवतारों के चिन्ह उन शिलाओं पर आ गए जिन्हें शालिग्राम शिला के नाम से जाना गया |

शास्त्रों के अनुसार चूँकि इस शिला में भगवान विष्णु स्वयं विराजमान हैं इसलिए इस शिला की पूजा करने से भगवान विष्णु का साक्षात आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में लगभग हर प्रकार की समस्या से मुक्ति इस शिला के पूजन से प्राप्त की जा सकती है | स्कन्दपुराण नामक ग्रन्थ के अनुसार शालिग्राम शिला एवं माँ लक्ष्मी के स्वरुप माँ तुलसी की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है इसलिए माँ तुलसी और शालिग्राम का विवाह भी करवाया जाता है | जितने भी ग्रंथों में शालिग्राम शिला के बारे में विवरण आता है सभी में इसकी पूजा आराधना और उपासना करने से दिव्य फल की प्राप्ति होती है एैसा लिखा गया है अतः इस भूमि के समस्त जनों के कल्याण के लिए भगवान विष्णु के साक्षात अवतार शालिग्राम शिला के दिव्य स्वरुप को घर लाकर आदर पूर्व उनकी स्थापना करनी चाहिए और नियमित रूप से भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए |

सौभाविक रूप से अंकित शंख, चक्र, गदा या पद्म बने होने के कारण इनकी स्थापना अपने घरों में करने से अत्यंत लाभ मिलता है | पुराणों में तो यहाँ तक कहा गया है की जिस घर में भगवान शालिग्राम स्थापित हों वह घर समस्त तीर्थों से भी श्रेष्ठ है | प्रति वर्ष कार्तिक मॉस की द्वादशी को महिलाऐं लक्ष्मी के स्वरुप माँ तुलसी और भगवान विष्णु के स्वरुप भगवान शालिग्राम का विवाह कराती हैं और लाभ प्राप्त करती हैं | शास्त्रों में कहा गया है कि पुरषोत्तम मॉस में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम का पूजन समस्त जीवन के दान पुण्य और शुभ कर्मों के फल के बराबर फल प्रदान करता है और यह पूजन करने वाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक में विचरण करता है | एैसा कहा गया है जहाँ भगवान विष्णु की शालिग्राम के रूप में पूजा की जाति है वहां माँ लक्ष्मी स्वयं वास करने लगती हैं और घर में सुख समृधि, सम्पत्ति एवं धन लक्ष्मी बरसने लगती है | “ॐ नमो भगवते वासुदेवाए नमः” के जाप से भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम शिला की पूजा करनी चाहिए |

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फ़रवरी मास के व्रत एवं त्यौहार

प्रदोष व्रत – 1/2/2015

1 फ़रवरी दिन रविवार को प्रदोष व्रत है | इस दिन व्रत रख कर भगवान शिव की पूजा किसी भी रूप में करनी चाहिए | इस दिन शिव स्रोत्रों के पाठ करने का विधान है | भगवान शिव को गुड़ की रेवड़ी का भोग लगाकर बाँटने से अभीष्ट फल की प्राप्ति की जा सकती है |

माघ पूर्णिमा – 3/2/2015

माघ पूर्णिमा का विशेष महत्व माना गया है | इस दिन किसी कर्मकाण्डी ब्राह्मण को आदर सहित घर बुलाकर माघ पूर्णिमा की कथा सुननी चाहिए | भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करना चाहिए | विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराके तिल, गुड़, घी आदि का दान करके यथा सम्भव दक्षिणा देकर ब्राह्मणों को विदा करे तत्पश्चात अपंग और असमर्थों को भोजन, कम्बल, फल आदि का दान करें | इस सिंहस्थ महाकुम्भ के वर्ष में माघ पूर्णिमा की पवित्र नदियों में स्नान का भी बड़ा महत्व माना गया है |

श्री महाशिवरात्रि व्रत – 17/2/2015

17 फ़रवरी दिन मंगलवार को महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाएगा | इस दिन भगवान शिव व माँ पार्वती का शुभ विवाह होने के कारण इसे सर्वश्रेष्ठ दिन माना गया है | इस दिन व्रत रखने वालों को अश्व मेघ यज्ञ के तुल्ये फल प्राप्त होता है | भगवान शिव का बिल्व पत्रों, चन्दन इत्र, दूध, दही, जल आदि से पूजन करना चाहिए | पूरा दिन भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए और विशेष कर रात्रि के चारों पहरों में मन्दिर जाकर विधिवत पूजा करनी चाहिए और प्रातः अमावस्या के दिन हवन करके ब्राह्मणों को भोजन उपरान्त मिष्ठान आदि व दक्षिणा देकर विदा करने के बाद स्वयं भोजन करके व्रत का समापन करना चाहिए | यह व्रत बहुत ही कल्याणकारी माना गया है |

इस प्रकार फ़रवरी मास के इन पर्वों को करके आप लाभान्वित भी हो सकते हैं और उपवास करने से शरीर को स्वस्थ रखने में भी मदद मिलती है |

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वार्षिक राशिफल 2015

नव वर्ष 2015 के शुभ आगमन पर हार्दिक शुभकामनाएं

नव वर्ष 2015 संवत् 2071,2072 आप सभी के लिए मंगलमाय सुख समृधि एवं सौभाग्य वर्धक हो एैसी प्रभु के श्री चरणों में हम कामना करते हें | पिछले वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष आप और अधिक लाभ प्राप्त कर सकें इसलिए हम आप सभी के लिए नव वर्ष 2015 में सभी 12 राशियों का वर्षफल उपायों सहित दे रहे हें ताकि आप उपाय करके ग्रहों का अच्छे से अच्छा फल प्राप्त कर सकें और घर परिवार एवं कारोबार में सुकून हासिल कर सकें | इस वर्ष जो ग्रह आपकी राशी पर अशुभ प्रभाव डालने वाले हें उनके प्रभाव को कम करने के लिए और जो ग्रह शुभ प्रभाव डालने वालें हें उनके प्रभाव को बड़ाने के लिए उपाय लिख रहा हूं ताकि आपको ग्रहों का शुभ फल मिल सके | यह फल हम प्रचलित नाम के प्रथम अख्शर के हिसाब से दे रहे हें ताकि आपको सुविधा रहे |वर्ष 2015 के प्रथम दिन ब्रह्मांड में ग्रहो की स्तिथि इस प्रकार रहेगी |

मेष : वर्ष का प्रारम्भ आपकी राशी पर गजकेसरी योग से हो रहा है इसलिए इस वर्ष name and fame अवश्य मिलेगी | छठा राहू आपको जितेन्द्रिये बना रहा है | जितेन्द्रिय मतलब जिसको कोई न जीत सके | नौवे भाव में सूर्य और दसम भाव में उच्च का मंगल आपको इस वर्ष भूमि से लाभ प्राप्त करा रहा है | यह वर्ष आपका आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छा है सिर्फ आप शनि देव की ढ्हिया से गुजर रहे हैं इसलिए आपको शनि के दान अवश्य करने चाहिए |

उपाय –

  1. काले तिल व तेल का दान करें |
  2. 14 मुखी रुद्राक्ष माला सहित धारण करें |
  3. हनुमानजी की उपासना करें |
  4. शिवलिंग पर शुद अत्र चढ़ाएँ |
  5. आठ किलो काले उड़द आठ शनिवार दान करें |

वृष : यह वर्ष आपको लेखन, विज्ञापन, सम्पादन आदि कार्यों से लाभ दे सकता है | यात्रा से सम्बन्धित कार्यों में भी लाभ मिलेगा | इस वर्ष ससुराल से भी धन प्राप्ति का योग है | इस वर्ष समाज में मान सम्मान बढेगा | पार्टनरशिप से भी लाभ प्राप्त किया जा सकता है | गुप्त विद्ध्याओं को सीखने का मन बन सकता है | विदेश से भी धन प्राप्ति का अच्छा योग बन रहा है | जिन बालकों या कन्याओं की आयु 16 साल की है वो इस वर्ष किसी भी प्रकार का नशा न करें अन्यथा अगले कई वर्षों तक इसका नुकसान भोगना पड़ेगा | बच्चों के माता पिता को इस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा |

उपाय –

  1. अपने भाई एवं भाभी की सेवा करें |
  2. महमानों को भोजन के पश्चात् मीठा खिलाएं |
  3. काली गाय को चारा खिलाएं |
  4. काले चने सरसों के तेल में छोंक लगा कर शनिवार के दिन बांटें |
  5. महिलाऐं गौरी शंकर और पुरुष ग्यारह व बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करें |

मिथुन : इस वर्ष आपको जलिय तत्वों एवं मिट्टी के कामों से लाभ मिलेगा | छठा शनि आपको जितेन्द्रिय बनायेगा | घरेलू जीवन में थोड़ी कटुता आ सकती है | सुख की हानि भी दिखाई दे रही है | शरीर में भी कष्ट की सम्भावना बन रही है | लेकिन disputed मामलों में आपको लाभ मिलता दिखाई दे रहा है | luxuries सुख सुविधायें भी इस वर्ष जरुर मिलेंगी | भाइयों का सहयोग भी मिलेगा | सिर्फ शरीर में वायु विकार बढ़ सकता है और शरीर को कष्ट हो सकता है इसका ध्यान अवश्य रखें |

उपाय –

  1. घर के बाहर गली के गड्डे मिटटी से भर दें |
  2. नारियल और बादाम जल प्रवाह करें |
  3. घर में काला कुत्ता पालें |
  4. 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करना |
  5. इस वर्ष पशुओं से सम्बन्धित कोई व्यापार न करें |

कर्क : इस वर्ष का शुभारम्भ आपकी राशी में उच्च के ब्रहस्पति के विराजमान से हुआ है | यह आपकी शिक्षा के लिए अति उत्तम है | आपके पिता श्री को भी इस वर्ष लाभ की प्राप्ति होगी | जमीन जायदाद का भी लाभ होगा | किसी से कोई सहायता भी मिल सकती है | जिनका सम्बन्ध चिकित्सा से है उनके लिए यह वर्ष सफलता दायक है | राजनीतिक लोगों के लिए भी अच्छा वर्ष है | ससुराल से भी लाभ प्राप्त होता दिखाई दे रहा है | सिर्फ शनि देव आपको पेट आदि में कष्ट दे सकते है और क़ानूनी मामलों में भी आपको सावधानी रखनी होगी अन्यथा कष्ट हो सकता है | शनि देव की शान्ति हेतु उपाय अति आवश्यक हें |

उपाय –

  1. पांच ग्राम केसर हर समय अपने पास रखें |
  2. नौ मुखी व 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करें |
  3. 108 रत्ती ओनी हर बुधवार को हरी बर्फी सहित दान करें |
  4. किन्नर को बुधवार के दिन हरी वस्तु भेंट करें |
  5. मांस मदिरा से परहेज रखना |
  6. पचास ग्राम बादाम मन्दिर ले कर जाओ पच्चिस ग्राम वहां चड़ा कर बाकी पच्चिस ग्राम घर लाकर सफ़ेद कपडे में बांध कर अलमारी में रख दो |
  7. अगर इस वर्ष सन्तान की प्राप्ति हो तो मीठे की जगह नमकीन बाँटना |

सिंह : इस वर्ष में आपकी राशी पर शनि देव की ढैय्या चल रही है | चौथा शनि कन्टक होता है कन्टक यानि कटीली राह परचलाने वाला | ग्रहस्थ सुख में कमी हो सकती है | धन का नुक्सान भी हो सकता है | शारीरिक कष्ट भी सम्भव है | इस वर्ष अगर आपकी सन्तान उत्पन हो तो मीठे की जगह नमकीन बाँटना अन्यथा कष्ट की प्राप्ति हो सकती है | जिनके विवाह इस वर्ष होंगे उनकी विवाह उपरान्त किस्मत चमकने वाली है | ससुराल से वाहन प्राप्ति हो सकती है | विदेश यात्रा का भी योग बन रहा है | किसी भी प्रकार का नशा नुकसानदायक रहेगा अतः मांस मदिरा का त्याग करें |

उपाय –

  1. केसर या हल्दी का तिलक करना |
  2. शुद्ध सोने का छला धारण करें |
  3. 400 ग्राम दूध कुएं में गिराएँ |
  4. 4 पव्वे रम जल प्रवाह करें या मजदूरों को पिलाएं |
  5. मछली व मदिरा का त्याग करें |
  6. मछली व मदिरा का त्याग करें |
  7. भोजन का पहला टुकड़ा कोवे को डालें |
  8. 11 व 12 मुखी रुद्राक्ष धारण करें |
  9. हनुमान जी की उपासना करें |
  10. शिवलिंग पर जल, दूध व शुद इत्र चढ़ाएँ |

कन्या : यह वर्ष आपके लिए जीवन की सभी सुख सुविधायें ले के आ रहा है | सरकार से मान सम्मान व धन की प्राप्ति इस वर्ष आपको होगी | मकान, वाहन का सुख भी इस वर्ष मिलेगा | भूमि के व्यापार से भी लाभ मिलेगा | ट्रांसपोर्ट के काम व विदेश के काम से लाभ प्राप्त करते हुए अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त करेंगे | सर्दी से होने वाले रोग या पानी से खतरा हो सकता है ध्यान रखें | इस वर्ष आपको अपने घर के मध्य में धुआं नहीं करना | बैंक की नोकरी या साहूकारी के धन्धे में लाभ होगा | व्यायाम आदि करने में मन लगेगा और फायेदा भी होगा | इस वर्ष आप दूसरों के काम बिगाड़ कर स्वयं सुख प्राप्त करने की कोशिश करेंगे |

उपाय –

  1. घर की छत पर बगेर दरवाजे के चोखट नहीं रखना |
  2. दुनियावी तीन कुत्तो की सेवा करना |
  3. वीरवार से प्रारम्भ करके चार दिन चार केले मन्दिर में भेंट करे और अगले चार दिन चार नीम्बू भेंट करें |
  4. शनिवार के दिन दूध से स्नान करें |
  5. चांदी का टुकड़ा गले में धारण करें |
  6. रुद्राक्ष माला में सुमेरु के रूप में 14 मुखी रुद्राक्ष लगवाकर धारण करें |

तुला : इस वर्ष तुला राशी के जातकों पर शनि की उतरती साढ़े सत्ती है | यह लाभदायक है लेकिन पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए आपको नशा छोड़ना पड़ेगा अन्यथा शनि महाराज कुपित होकर नुक्सान देंगे | व्यापार नौकरी में तरक्की तो मिलेगी लेकिन दीनता भी रहेगी | इस वर्ष आपकी पत्नी का आपकी माता से कलेश हो सकता है जिसमें आपको संघर्ष झेलना पड़ सकता है लेकिन ज़मीन जायदाद का लाभ मिल सकता है | वाहन सुख भी मिलेगा | कुल मिलाकर यह वर्ष अच्छा है लेकिन इस वर्ष में अच्छा फल प्राप्त करने के लिए आपको हर प्रकार का नशा छोड़ना पड़ेगा अन्यथा शुभ फलों में कमी आयेगी |

उपाय –

  1. वर्ष भर हनुमान जी की उपासना करें |
  2. शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ |
  3. मृतुन्जय मन्त्र का पाठ करें |
  4. 12 व 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करें |

वृश्चिक : आपकी राशी पर शनि देव विराजमान हैं अतः आप साढ़े सत्ती के प्रभाव में हैं | पेट व ह्रदय पर साढ़े सत्ती कष्ट दायक है अतः इसका उपाय अति आवश्यक है | इस वर्ष आपकी रूचि धार्मिक कार्यों में अधिक रहेगी | जौहरी सराफा के काम करने वालों को यह वर्ष लाभदायक रहेगा | लेखक, सम्पादक व मीडिया से सम्बन्धित काम करने वालों को भी यह वर्ष लाभ देगा | पेशाब, गुर्दे व पेट से सम्बन्धित रोग परेशान करेंगे ध्यान रखें | जिन जातकों की शादी इस वर्ष होगी उनको ससुराल से लाभ होता दिखाई दे रहा है |

उपाय –

  1. इस वर्ष अपना व सन्तान का जन्म दिन नहीं मनाना |
  2. वीराने में सुरमा दबाना |
  3. बन्दर की सेवा करना |
  4. 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करना |
  5. गायत्री मन्त्र का पाठ करना |
  6. नीला कपडा नहीं पहनना |

धन : धन राशी के सभी जातक चढ़ती साढ़े सत्ती के शिकार हैं | शरीर पर चढ़ती साढ़े सत्ती पैरों में वायु विकार पेद्दा करेगी | शारीरिक कष्ट का समय है | गुप्त व अध्यात्मिक विद्याओं को सीखने के लिए यह वर्ष अति उत्तम है | उच्च अधिकारीयों से लाभ प्राप्त करेंगे | लाभ कारी यात्राएं इस वर्ष आपको करने को मिलेंगी | विदेश से भी इस वर्ष लाभ मिलने के योग बन रहे हैं | यह वर्ष आपके पिता जी के लिए भी लाभकारी रहने वाला है | चाल चलन को सम्भाल के चलेंगे तो इस वर्ष अच्छे लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं | इस वर्ष मधुमेह रोग से अपना बचाव रखें |

उपाय –

  1. गुरुवार को गणपति भगवान को केसर के चार लड्डू भेंट करें |
  2. कुल पुरोहित की सेवा करें |
  3. मांस मछली व मदिरा का प्रयोग न करें |
  4. न झूट बोलना न झूठा खाना |
  5. सुन्दर काण्ड का पाठ करना अति आवश्यक है |
  6. भगवान शिव की उपासना करें |
  7. 11 मुखी व 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करें |

मकर : जिन जातकों की आयु 28 वर्ष है उनके लिए यह वर्ष अति उत्तम है | इस वर्ष लकड़ी, मकान व मशीनरी आदि के काम करने वालों को अच्छा लाभ प्राप्त होगा | इस वर्ष विवाह हुआ तो किस्मत चमकने के पूरे पूरे योग हैं | ज्ञान प्राप्ति के लिए समय उपयुक्त है | चिकित्सा से सम्बन्धित काम करने वालों के लिए भी यह वर्ष बहुत लाभदायक है | विदेश सम्बन्धी कार्यों से भी लाभ की सम्भावना दिखाई दे रही है | लाटरी सट्टे में नुक्सान होगा ध्यान रखें | भाई बन्धुओं से विरोध हो सकता इसका भी ध्यान रखें | बाकी वर्ष मिला जुला है उपायों से इसे और अच्छा बना सकते हैं |

उपाय –

  1. शरीर पर शुद्ध सोना धारण करें |
  2. कुत्तों की सेवा करें |
  3. घर में चांदी की ईंट रखें |
  4. किसी के बारे में गलत नहीं बोलना |
  5. हनुमान जी को सिन्दूर लगाना |
  6. 10 मुखी व 11 मुखी रुद्राक्ष धारण करना |
  7. ॐ नमः शिवाय मन्त्र का पाठ करना |

कुम्भ : यह वर्ष आपको इज्जत मान दिलाने वाला और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला है | इस वर्ष आपको सन्तान सुख मिलेगा | आपके मामा, ताया, चाचा भी लाभ में रहेंगे | इस वर्ष आपकी इच्छाएँ भी ऊँची रहेंगी | गुप्त व अध्यात्मिक विद्याओं को जानने के लिए यह वर्ष अच्छा है | मीठी चीजों का व्यापार करने वाले जातकों को बहुत लाभ रहेगा | स्त्री पक्ष से भी लाभ मिलेगा लेकिन कर्म स्थान में शनि महाराज चल रहे हैं | अगर किसी भी प्रकार का नशा किया तो सभी शुभ फल अशुभ होते चलें जायेंगे | ध्यान भी रखें और उपाय भी अवश्य करें |

उपाय –

  1. गुरुवार को पीले लड्डू मन्दिर में चढ़ाएँ |
  2. ब्राह्मण को आदर सहित पीला वस्त्र भेंट करें |
  3. अपने पास कोई भी हथियार न रखें |
  4. मछली व मदिरा का त्याग करें |
  5. चांदी का चौरस टुकड़ा अपने पास रखे |
  6. 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करें |

मीन : यह वर्ष आपके ससुराल व परिवार के लिए इतना अच्छा नहीं है | ग्रहस्थ जीवन में थोड़ी टेन्शन रहेगी ध्यान रखें | इस वर्ष आपकी नजर कमज़ोर हो सकती है | पूजा पाठ में मन कम लगेगा | मांस मदिरा का शौक लगेगा लेकिन धन भी इस वर्ष खूब आयेगा | लोहे लकड़ी वालों को कम लेकिन सफेद वस्तुओ के काम करने वालों को अधिक फायदा होगा | इस वर्ष जो लोग राजनीति में हैं उनकों भी लाभ मिलेगा और सरकार से भी लाभ की प्राप्ति सम्भव है | मिला जुला वर्ष है उपाय करने से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है |

उपाय –

  1. इस वर्ष घर में मणि प्लांट न लगायें |
  2. अपने सर को ढक के रखें |
  3. घर में कलेजी लगवाएँ |
  4. माथे पर केसर का तिलक लगायें |
  5. घर की छत्त को बिलकुल साफ़ रखें |
  6. 8,9 एवं 10 मुखी रुद्राक्ष धारण करें |
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नव वर्ष 2015 का resolution

मैं सुखी हो जाऊँ यह स्वार्थ चिन्तन है शहर सुखी हो जाये यह धर्मार्थ चिन्तन है जगत सुखी हो जाये यह परमार्थ चिन्तन है | अगर हम परमार्थ चिन्तन करते है तो यह बहुत अच्छा है लेकिन अगर हम धर्मार्थ चिन्तन भी करें तो यह भी अच्छा है लेकिन केवल स्वार्थ चिन्तन उपयुक्त नहीं है | आओ आज वर्ष 2015 के पहले दिन हम यह संकल्प करें कि इस वर्ष में केवल अपनी चिंता न करके बल्कि अपने समाज व शहर की भी चिंता करते हुए किसी एक आदमी के दुख को भी कम कर सकें तो जरुर करेंगे | जिस प्रकार देश के प्रधान मंत्री जी ने एक झाड़ू उठाया तो सारे भारत में सफाई अभियान शुरू हो गया उसी प्रकार यदि आप एक आदमी का भी भला सोचेंगे तो यकीनन सारे शहर का भला हो जायेगा | तो इस साल हम सब मिलकर धर्मार्थ चिन्तन अवश्य करेंगे | यही वर्ष 2015 का resolution होना चाहिए |

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माता पिता की सेवा

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता, मातरम् पितरम तस्मात् सर्वयत्नेन पूज्येत |

अर्थात माता में सभी तीर्थों का वास है और तीर्थों की पवित्रता से भी अधिक पवित्र माता होती है | इसी प्रकार पिता में सभी देवता प्रतिष्ठित है | देवता पत्थरों में कम और माता पिता के चरणों में अधिक बसते हैं | इसलिए जितनी अधिक हो सके माता पिता की सेवा करनी चाहिए | वैसे भी हिन्दू संस्कृति में पुत्र के लिए अपने माता पिता की सेवा एवं उनकी आज्ञा का पालन करना महत्वपूर्ण माना गया है | इसे सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है | ग्रंथों में भी कहा गया है कि मात्रदेवो भव | पितृ देवो भव | आचार्य देवो भव |

अर्थात माता पिता एवं आचार्य को देवता मानने वाले बनो | पदमपुराण नामक ग्रन्थ में तो यहाँ तक लिखा है कि जो पुत्र कटू शब्दों द्वारा माता पिता की निंदा करता है और दुखी तथा रोग से पीड़ित एवं वृद्ध माता पिता का त्याग करता, है उस पुत्र को नरक में जाने से और नरक रूपी जीवन जीने से कोई देवता भी नहीं बचा सकता | दूसरी ओर माता पिता की सेवा करने वालों की सद्गति एवं सुख प्राप्त करने के हजारों प्रमाण हमारे शास्त्रों में भरे पड़े है |

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता ही परमं तपः |

पितरीं प्रितिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः |

पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सर्वश्रेष्ठ तपस्या है | पिता के प्रसन्न हो जाने पर देवता स्वयं प्रसन्न हो जाते है | माता पिता की सेवा से नित्यप्रति गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है | संत तुलसीदास जी ने भी कहा है कि मातु पिता गुर प्रभु के वाणी | बिनहिं विचार करिए शुभ जानी |

अर्थात माता पिता की सेवा जीवन पर्यन्त तो करनी ही चाहिए अपितु उनके मरने के पश्चात् उनके श्राद्ध एवं तर्पण आदि कार्य करना भी नितान्त आवश्यक परम धर्म माना गया है | पितरों के श्राद्ध एवं तर्पण का फल भी तो पुत्र को ही मिलता है इसमें कोई सन्देह नहीं है | अतः सभी को अपने माता पिता की सेवा करनी चाहिए मार्कंडय पुराण में भी तो यही लिखा आया है |

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मासिक व्रत एवं पर्व

वर्ष 2015 में हर महीने के प्रारम्भ में हम उस मास के सर्व कल्याणकारी व्रत पर्व एवं पूजा बतायेंगे जिसको करके आप लाभान्वित हो सकते हैं |

यह वर्ष पुत्रदा एकादशी जैसे अति शुभ दिन से प्रारम्भ हो रहा हे | 1 जनवरी को पुत्रदा एकादशी का पावन पर्व है | इस दिन व्रत रखकर भगवान श्री राधा कृष्ण का पूजन विधि विधान से करके, राधा कृष्ण स्रोत्र का पाठ करना चाहिए | कृष्ण भगवान जी के बाल स्वरूप के दर्शन करके “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” का पाठ करके, वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन करवाके, यथाशक्ति दान आदि देकर आशीर्वाद प्राप्त करने से पुत्र की प्राप्ति होती है अतः जिन माताओं बहनों को सन्तान कष्ट हो उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिए |

गणेश संकट चतुर्थी व्रत – 8/1/2015

इसे गौरी चतुर्थी, सौभाग्य सुन्दरी व्रत एवं वक्रतुंड चतुर्थी भी कहा जाता है | इस दिन व्रत रख के गणपति का पूजन करें और सायेंकाळ में सवा पांच किलो का एक ही देसी घी का लड्डू मन्दिर जाकर भगवान गणपति को भोग लगायें और प्रसाद बाँट कर स्वयं भी खाएँ | रात्रि में चन्द्रमा निकलने के पश्चात चन्द्र देव का पूजन करके “ॐ सोम सोमाय नमः” का पाठ करके चन्द्र देव को अर्द्ध देना चाहिए | इस व्रत को जनवरी मास से प्रारम्भ करके सारा साल हर महीने चतुर्थी के दिन करने से हर प्रकार के विघ्न समाप्त होने लग जाते है |

लोहड़ी पर्व – 13/1/2015

यह पर्व उत्तर भारत में मनाया जाता है | इस दिन अग्नि देव की पूजा की जाती है | उत्तर भारत में इस पर्व को भाईचारे के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है | अग्नि देव को तिल की रेवड़ियों का भोग लगाया जाता है | अग्नि देव की पूजा की जाती है और उसके पश्चात सभी लोग मिलकर खूब नाचते गाते हैं | इस नाच को भांगड़ा व गिद्धा कहते हैं | बीच में लकड़ियाँ जलाकर उसमें तिल की रेवड़ी व मूंगफली की आहूति डालकर उसके चारों ओर नाच गाकर इस त्यौहार को मनाया जाता है |

मोनी अमावस्या – 20/1/2015

माघ मास में मंगलवार के दिन अगर मोनी अमावस्या आ जाए तो इसका महत्व बहुत बढ़ जाता है | विशेषकर इस दिन तीर्थ स्थान पर जाकर दान करने का विधान है लेकिन अगर तीर्थ स्थान पर न भी जा सकें तो अपने घर पर वेदपाठी ब्राह्मण को आदर सहित बुलाकर उन्हें भोजन कराके तिल के लड्डू, फल व उनी वस्त्र भेंट करना चाहिए | इस दिन प्रयास करके मौन रहना चाहिए | कम बोलकर अमावस्या का व्रत करके ब्राह्मण को भोजन करवा कर दक्षिणा आदि देने से अक्षय फल की प्राप्ति की जा सकती है |

वसन्त पंचमी – 24/1/2015

माँ सरस्वती का पूजन इस दिन विशेष फलदायक होता है | इस दिन धूप दीप, गुलाल व फूलों से माँ सरस्वती का पूजन करके पीले मीठे चावलों का भोग लगाकर स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए |

तिल द्वादशी – 31/1/2015

इस दिन जल में तिल डालकर स्नान करके भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करें | तिल के तेल का दीपक जलाएं और हवन में तिल की ही आहुति डालें | तिल की ही मिठाई का भोग लगायें | तिल का ही भोजन करें व कराएँ | तिल ही दान करें दक्षिणा सहित | इस प्रकार इस व्रत को करने से जीवन की सम्पूर्ण व्याधियां दूर होकर सुख शान्ति की प्राप्ति होती है |

इस प्रकार जनवरी मास के इन पर्वों को करके आप लाभान्वित भी हो सकते हैं और उपवास करने से शरीर को स्वस्थ रखने में भी मदद मिलती है |

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शनि कष्टों का निवारण पिप्लादी साधना

ब्रह्माण्ड में शनि ग्रह को सबसे महत्वपूर्ण पद दण्डाधिकारी का पद मिला हुआ है | मनुष्य के पिछले जन्मों के कर्मों का लेखा-जोखा करने के पश्चात व्यक्ति को दुखों रूपी अग्नि में तपाकर कुन्दन बनाने का काम शनि महाराज के अन्तर्गत आता है लेकिन विधाता ने दुखों को कम करने के उपाय भी बताये हैं |

शनि जनित कष्टों से भगवान शिव का नाम ही बचा सकता है इसलिए पिप्लाद भगवान की साधना करने वाले मनुष्यों को शनि भगवान पीड़ा नहीं देते | शनि संकट को दूर करने के लिए ही भगवान शंकर ने पिप्लाद के रूप में जन्म लिया | ऋषि पिप्लाद ब्रह्मा जी के वंशज महर्षि दधीचि जी के सपुत्र थे | जब महर्षि दधीचि ने तीनों लोकों के कल्याण के लिए जीते जी अपनी देह दान करके अपनी हड्डियों को देवराज इन्द्र के सपुर्द किया उस समय दधीचि ऋषि की पत्नी सुवर्चा जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठी करने गई हुई थी | जब उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान से इस देह दान को देखा व समझा तो मारे गुस्से के अपने द्वारा लाई लकड़ियों की चिता बनाकर बोली कि हे पतिदेव मैं आपको वापिस तो नहीं ला सकती लेकिन आपके पास तो आ सकती हूँ | यह कहकर ज्योंही ऋषि पत्नी ने अपनी चिता को आग लगाई तभी पूरा ब्रह्माण्ड काँपने लगा क्योंकि महर्षि दधीचि और पत्नी सुवर्चा दोनों ही भगवान शिव के परम भक्त थे और देवताओं को भगवान शिव के आश्वासन के फलस्वरूप स्वयं भगवान ही ऋषि पत्नी की कोख में पल रहे थे | उसी समय आकाश से भविष्य वाणी हुई कि हे सुवर्चा तुम्हारे साथ जो हुआ है वह बहुत ही गलत हुआ है लेकिन यह पूरे ब्रह्माण्ड को बचाने के लिए हुआ है | अगर महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र का निर्माण न होता तो महाबली वृतासुर का वध नहीं होता और सारी सृष्टि पर असुरों का राज हो जाता | इसलिए अपने साथ भगवान शिव के अंश अवतार को मार देना महा पाप है | तब सुवर्चा बोली कि अगर मेरी कोख में भगवान शिव का अंश अवतार पल रहा है तो मैं इसी क्षण उन्हें प्रकट करके अपने प्राण त्याग दूंगी | यह कहते हुए सुवर्चा ने एक नुकीले पत्थर से अपना पेट काटकर बच्चे का जन्म कराया और अपने प्राण त्याग दिये | भगवान शिव का अंश अवतार होने के कारण बालक का शरीर दिव्य तेज से जगमगा रहा था | नीले कंठ पर सर्प लिपटा था | दया का सागर आँखों में हिलोरें ले रहा था | कपूर सी गोरी व सुगन्धित काया से युक्त बालक पीपल के वृक्ष के नीचे पत्थर पर लेटा था | तभी ब्रह्मा जी सहित सभी देवता वहां आ गए और भगवान शिव के अंश अवतार के दर्शन करने लगे | तभी ब्रह्मा जी बोले कि महर्षि दधीचि के पुत्र रूद्र अवतार है और शिव की तरह ही जगत का कल्याण करेंगे | पीपल के वृक्ष के नीचे जन्म होने के कारण ब्रह्मा जी ने रूद्र अवतार का नाम पिप्लाद रखा |

आगे चल कर भगवान शिव के अंश अवतार महर्षि दधीचि के पुत्र महर्षि पिप्लाद ने कठोर तपस्या करके कई सिद्धियाँ हासिल की और शनि देव की शक्तियों पर नियन्त्रण कर लिया | उन्होंने शनि देव से दो संकल्प कराये | पहला बाल अवस्था में किसी मनुष्य को कष्ट नहीं दोगे और दूसरा कि पिप्लादी साधना करने वालों को कभी कष्ट नहीं दोगे | महर्षि पिप्लादी की कृपा से शनि देव इस प्रतिज्ञा से बंधे है | शनि का संकट दूर करने के लिए ही भगवान शंकर ने पिप्लाद के रूप में जन्म लिया था | तभी से शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष के समीप भगवान शंकर के अंश अवतार व महर्षि दधीचि के पुत्र महामुनि महर्षि पिप्लाद की साधना करने से शनि संकट रुपी सभी रोग, शोक, दीनता, दुख व दरिद्रता आदि सभी दूर होकर जीवन सफल हो जाता है |

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वेदों का नेत्र ज्योतिष

माँ सरस्वती जी की वन्दना के पश्चात्, ज्योतिष के विषय में इतना बताना चाहूँगा कि ज्योतिष शास्त्र में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है, यह विशुद्ध विज्ञान है | आज के आधुनिकतम विज्ञान का रहस्य इसके गर्भ से ही निकलता है | ज्योतिष शब्द की व्युत्पति ज्योति से हुई है | ज्योति का अर्थ है प्रकाश | जिस ज्ञान के शब्दों से प्रकाश की किरणें निकलती हों ऐसे शब्दों के सार को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है | आज से सहस्त्रो वर्ष पूर्व ‘श्री सूर्य, भृगु, अत्री कश्यप, बृहस्पति, पाराशर आदि महर्षियों ने लोक कल्याण हेतु इस विद्या को प्रकाशित एवं प्रचलित किया था |
Astrology is a science which has come down to us as a gift from Ancient Rishis.

हिन्दू धर्म में चार वेदों को मान्यता प्राप्त है – ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद जिन्हें सभी विद्याओ का मूल माना जाता है | इन्हीं वेदों में से ऋग्वेद के छठे अंग को ज्योतिष कहा गया है इसीलिए ज्योतिष को ज्योतिषामयनं चक्षुः यानि वेदों का नेत्र भी कहा गया है | जिस प्रकार नेत्रों से विभिन्न वस्तुओ की गतिविधियों को देखा जाता है, उसी प्रकार से ज्योतिष शास्त्र द्वारा भूत, भविष्य एवं वर्तमान काल में घटने वाली घटनाओं की जानकारी मिल सकती है | चन्द्रमा की शीतलता के प्रभाव से समुद्र में ज्वार भाटा आता है | सूर्य की गर्मी से कोणार्क में फसलें पकती है यह बात हम सभी जानते हैं | उसी प्रकार से सूर्य, चन्द्र व अन्य ग्रहों का पृथ्वी व पृथ्वी वासियों पर प्रभाव पड़ता है |

ज्योतिष के दो विभाग होते हैं – गणित एवं फलित | गणित द्वारा ब्रह्माण्ड में ग्रहों की स्थिति एवं फलित द्वारा ग्रहों का जीवन पर असर देखा जाता है | इन्सान का जीवन और सुख दुख, इनका आपस में अटूट रिश्ता है | इस अटूट बन्धन में ज्योतिष का अपना महत्व है यह बात भविष्य पुराण, स्कन्द पुराण, नारद संहिता, वृहद सहिंता आदि ग्रंथों से प्रमाणित होती है | मानव कर्मशील होते हुए ग्रह चाल के अनुसार चलने को विवश है | प्रारब्ध के फल सवरूप मानव को लाभ-हानि, मान-सम्मान, अच्छे बुरे फल भोगने पड़ते है | पिछले 30 वर्षो के अनुसंधान में हमने पाया कि रत्न, रुद्राक्ष एवं मन्त्रों से ग्रहों के शुभ प्रभाव को बढाया एवं अशुभ प्रभाव को कम किया जा सकता है जिससे जीवन में खुशहाली प्राप्त की जा सकती है |

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ब्रह्मूर्त में उठने के लाभ

दिन के चौबीस घन्टों में से वेदाध्ययन, योगाभ्यास, ध्यान, कुण्डलिनी जागरण, आधात्मिक क्रियाओं व् बच्चों की पढाई हेतु यह समय सबसे उपयुक्त है | रात्रि के चतुर्थ पहर में चन्द्रमा की किरणें अमृत कणों से युक्त होने के कारण पृथ्वी पर अमृत रुपी शीतलता प्रदान करती है जो शारीरिक और मानसिक बल प्रदान करती है इसलिए प्रातः 4 बजे से साढ़े पांच बजे तक के समय को अमृत बेला भी कहा गया है | वेदों के अनुसार इस समय को ही ब्रह्म मुहर्त कहा गया है और इस समय उठने वाले पुरुष महिला व बच्चों को शारीरिक व मानसिक रोग दूसरों की अपेक्षा कम पाए जाते है क्योंकि ब्रहम मुहर्त में चल रही वायु में ऑक्सिजन की मात्रा अधिक पाई जाती है | यह बात तो वैज्ञानिक भी मानते हैं |

प्रातः काल हाथ दर्शन एवं स्मरण

अमृत बेला में उठकर सर्व प्रथम अपने दोनों हाथों को सामने से देखते हुए इस श्लोक का पाठ करना चाहिए | कराग्रे वसते लक्ष्मी ; कर मध्य सरस्वती | करमूले स्थिता गौरी प्रभाते कर दर्शनम |

हाथों के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य भाग में सरस्वती, तथा मूल भाग में मणिबन्ध के पास माँ गौरी निवास करती हैं | हाथों को कर्मों का प्रतीक रूप माना गया है और कर्मों को सम्पन करने में माँ लक्ष्मी एवं माँ सरस्वती अर्थात धन एवं बुद्धि यानि ज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | ज्ञान और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए हमारे हाथों से समस्त क्रियाएँ हों यही भावना मन में धारण करके प्रात कर दर्शन का विधान तय हुआ है | इस के इलावा भाग्य को प्राप्त करने के लिए भी इन्हीं हाथों द्वारा कर्मों को करने की आवश्यकता होती है | अतः अमृत बेला में यानि प्रात उठकर कर दर्शन के पश्चात् हाथों को अपने मस्तक पर लगा कर हमें अपना दिन प्रारम्भ करना चाहिए |

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बारह मुखी रुद्राक्ष

बारह मुखी रुद्राक्ष भगवान महाविष्णु का स्वरुप माना गया है | बारह आदित्यों का तेज इस रुद्राक्ष में सम्माहित है इसलिए भगवान सूर्य देव की विशेष कृपा का भी पात्र है यह रुद्राक्ष |

बारह मुखी रुद्राक्ष के लाभ

इसको धारण करने मात्र से असाध्य व भयानक रोगों से मुक्ति मिलती है | ह्रदय रोग, उदार रोग व मस्तिष्क से सम्बन्धित रोगों में इस रुद्राक्ष को धारण करने से लाभ हो सकता है ऐसा कई ग्रन्थों में लिखा मिलता है | बारह मुखी रुद्राक्ष को कंठ में या कान के कुण्डल में धारण करने से भगवान विष्णु व सूर्य देव दोनों ही अति प्रसन्न होते हैं | इस रुद्राक्ष को द्वादश आदित्यों की कृपा प्राप्त होने से अश्वमेघ यज्ञ सहित कई यज्ञों का फल प्राप्त होता है | बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने से तन और मन स्वस्थ होते हैं और एक विशेष प्रकार की शक्ति उत्पन्न होती है | राजनीति व सरकारी क्षेत्रों में काम करने वाले जातकों के लिए बारह मुखी रुद्राक्ष अति उत्तम माना गया है | गोवध करने वाले पापी व रत्नों की चोरी करने जैसे महापाप में भी इस रुद्राक्ष के धारण करने से भगवान सूर्य की कृपा प्राप्त होती है और पापों से व्यक्ति मुक्त हो जाता है एैसा हमारे ग्रन्थों में कहा गया है | यह रुद्राक्ष क्षत्रुओं का नाश करके व्याधियों का नाश करके सूर्य आदि ग्रहों के कमज़ोर प्रभाव को नष्ट करके सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति करवाता है इसलिए इस रुद्राक्ष को सभी को धारण करना चाहिए |

बारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र

इस रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र “ॐ क्रोम श्रोम रोम नमः” है | इस मंत्र की तीन माला या “ॐ नमः शिवाय” मंत्र की पांच माला या मृत्युंजय मंत्र की एक माला नित्य प्रति करने से समस्त प्रकार के रोगों से व समस्याओं से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है और लाभान्वित हुआ जा सकता है अतः सभी को भगवान सूर्य और भगवान विष्णु के स्वरुप रूपी बारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए |

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*Descriptions for products are taken from scripture, written and oral tradition. Products are not intended to diagnose, treat, cure, or prevent any disease or condition. We make no claim of supernatural effects. All items sold as curios only.

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