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शालिग्राम

आप सभी जानते हैं कि भारत भूमि ऋषियों मुनियों की भूमि रही है | हिन्दू संस्कृति बहुत ही दुर्लभ संस्कृति है इसलिए बहुत ही दुर्लभ वस्तुएं देवी देवताओं के अवतार के रूप में हमें इस भूमि पर मिली हैं | यह हम सबका परम सौभाग्य है कि एैसी ही एक वस्तु शालिग्राम शिला के रूप में भगवान विष्णु के दस अवतारों के स्वरुप में हमें मिली है |

शास्त्रों के मुताबिक भगवान विष्णु के साक्षात स्वरुप में शालिग्राम शिला के बारे में सबसे प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की दोनों पत्नियों माँ सरस्वती एवं माँ लक्ष्मी जी में एक समय झगड़ा हो गया | इस झगड़े के फलस्वरूप माँ सरस्वती के श्राप के कारण से माँ लक्ष्मी जी तुलसी के रूप में सदा के लिए इस पृथ्वी पर विराजमान हो गई | भगवान विष्णु महालक्ष्मी को वापस स्वर्ग में ले जाने के लिए गण्डकी नदी में शिला के रूप में इंतज़ार करते रहे और जल में बहने के कारण से भगवान विष्णु के दसों अवतारों के चिन्ह उन शिलाओं पर आ गए जिन्हें शालिग्राम शिला के नाम से जाना गया |

शास्त्रों के अनुसार चूँकि इस शिला में भगवान विष्णु स्वयं विराजमान हैं इसलिए इस शिला की पूजा करने से भगवान विष्णु का साक्षात आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में लगभग हर प्रकार की समस्या से मुक्ति इस शिला के पूजन से प्राप्त की जा सकती है | स्कन्दपुराण नामक ग्रन्थ के अनुसार शालिग्राम शिला एवं माँ लक्ष्मी के स्वरुप माँ तुलसी की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है इसलिए माँ तुलसी और शालिग्राम का विवाह भी करवाया जाता है | जितने भी ग्रंथों में शालिग्राम शिला के बारे में विवरण आता है सभी में इसकी पूजा आराधना और उपासना करने से दिव्य फल की प्राप्ति होती है एैसा लिखा गया है अतः इस भूमि के समस्त जनों के कल्याण के लिए भगवान विष्णु के साक्षात अवतार शालिग्राम शिला के दिव्य स्वरुप को घर लाकर आदर पूर्व उनकी स्थापना करनी चाहिए और नियमित रूप से भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए |

सौभाविक रूप से अंकित शंख, चक्र, गदा या पद्म बने होने के कारण इनकी स्थापना अपने घरों में करने से अत्यंत लाभ मिलता है | पुराणों में तो यहाँ तक कहा गया है की जिस घर में भगवान शालिग्राम स्थापित हों वह घर समस्त तीर्थों से भी श्रेष्ठ है | प्रति वर्ष कार्तिक मॉस की द्वादशी को महिलाऐं लक्ष्मी के स्वरुप माँ तुलसी और भगवान विष्णु के स्वरुप भगवान शालिग्राम का विवाह कराती हैं और लाभ प्राप्त करती हैं | शास्त्रों में कहा गया है कि पुरषोत्तम मॉस में एक लाख तुलसी दल से भगवान शालिग्राम का पूजन समस्त जीवन के दान पुण्य और शुभ कर्मों के फल के बराबर फल प्रदान करता है और यह पूजन करने वाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक में विचरण करता है | एैसा कहा गया है जहाँ भगवान विष्णु की शालिग्राम के रूप में पूजा की जाति है वहां माँ लक्ष्मी स्वयं वास करने लगती हैं और घर में सुख समृधि, सम्पत्ति एवं धन लक्ष्मी बरसने लगती है | “ॐ नमो भगवते वासुदेवाए नमः” के जाप से भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम शिला की पूजा करनी चाहिए |

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माता पिता की सेवा

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता, मातरम् पितरम तस्मात् सर्वयत्नेन पूज्येत |

अर्थात माता में सभी तीर्थों का वास है और तीर्थों की पवित्रता से भी अधिक पवित्र माता होती है | इसी प्रकार पिता में सभी देवता प्रतिष्ठित है | देवता पत्थरों में कम और माता पिता के चरणों में अधिक बसते हैं | इसलिए जितनी अधिक हो सके माता पिता की सेवा करनी चाहिए | वैसे भी हिन्दू संस्कृति में पुत्र के लिए अपने माता पिता की सेवा एवं उनकी आज्ञा का पालन करना महत्वपूर्ण माना गया है | इसे सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है | ग्रंथों में भी कहा गया है कि मात्रदेवो भव | पितृ देवो भव | आचार्य देवो भव |

अर्थात माता पिता एवं आचार्य को देवता मानने वाले बनो | पदमपुराण नामक ग्रन्थ में तो यहाँ तक लिखा है कि जो पुत्र कटू शब्दों द्वारा माता पिता की निंदा करता है और दुखी तथा रोग से पीड़ित एवं वृद्ध माता पिता का त्याग करता, है उस पुत्र को नरक में जाने से और नरक रूपी जीवन जीने से कोई देवता भी नहीं बचा सकता | दूसरी ओर माता पिता की सेवा करने वालों की सद्गति एवं सुख प्राप्त करने के हजारों प्रमाण हमारे शास्त्रों में भरे पड़े है |

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता ही परमं तपः |

पितरीं प्रितिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः |

पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सर्वश्रेष्ठ तपस्या है | पिता के प्रसन्न हो जाने पर देवता स्वयं प्रसन्न हो जाते है | माता पिता की सेवा से नित्यप्रति गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है | संत तुलसीदास जी ने भी कहा है कि मातु पिता गुर प्रभु के वाणी | बिनहिं विचार करिए शुभ जानी |

अर्थात माता पिता की सेवा जीवन पर्यन्त तो करनी ही चाहिए अपितु उनके मरने के पश्चात् उनके श्राद्ध एवं तर्पण आदि कार्य करना भी नितान्त आवश्यक परम धर्म माना गया है | पितरों के श्राद्ध एवं तर्पण का फल भी तो पुत्र को ही मिलता है इसमें कोई सन्देह नहीं है | अतः सभी को अपने माता पिता की सेवा करनी चाहिए मार्कंडय पुराण में भी तो यही लिखा आया है |

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शनि कष्टों का निवारण पिप्लादी साधना

ब्रह्माण्ड में शनि ग्रह को सबसे महत्वपूर्ण पद दण्डाधिकारी का पद मिला हुआ है | मनुष्य के पिछले जन्मों के कर्मों का लेखा-जोखा करने के पश्चात व्यक्ति को दुखों रूपी अग्नि में तपाकर कुन्दन बनाने का काम शनि महाराज के अन्तर्गत आता है लेकिन विधाता ने दुखों को कम करने के उपाय भी बताये हैं |

शनि जनित कष्टों से भगवान शिव का नाम ही बचा सकता है इसलिए पिप्लाद भगवान की साधना करने वाले मनुष्यों को शनि भगवान पीड़ा नहीं देते | शनि संकट को दूर करने के लिए ही भगवान शंकर ने पिप्लाद के रूप में जन्म लिया | ऋषि पिप्लाद ब्रह्मा जी के वंशज महर्षि दधीचि जी के सपुत्र थे | जब महर्षि दधीचि ने तीनों लोकों के कल्याण के लिए जीते जी अपनी देह दान करके अपनी हड्डियों को देवराज इन्द्र के सपुर्द किया उस समय दधीचि ऋषि की पत्नी सुवर्चा जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठी करने गई हुई थी | जब उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान से इस देह दान को देखा व समझा तो मारे गुस्से के अपने द्वारा लाई लकड़ियों की चिता बनाकर बोली कि हे पतिदेव मैं आपको वापिस तो नहीं ला सकती लेकिन आपके पास तो आ सकती हूँ | यह कहकर ज्योंही ऋषि पत्नी ने अपनी चिता को आग लगाई तभी पूरा ब्रह्माण्ड काँपने लगा क्योंकि महर्षि दधीचि और पत्नी सुवर्चा दोनों ही भगवान शिव के परम भक्त थे और देवताओं को भगवान शिव के आश्वासन के फलस्वरूप स्वयं भगवान ही ऋषि पत्नी की कोख में पल रहे थे | उसी समय आकाश से भविष्य वाणी हुई कि हे सुवर्चा तुम्हारे साथ जो हुआ है वह बहुत ही गलत हुआ है लेकिन यह पूरे ब्रह्माण्ड को बचाने के लिए हुआ है | अगर महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र का निर्माण न होता तो महाबली वृतासुर का वध नहीं होता और सारी सृष्टि पर असुरों का राज हो जाता | इसलिए अपने साथ भगवान शिव के अंश अवतार को मार देना महा पाप है | तब सुवर्चा बोली कि अगर मेरी कोख में भगवान शिव का अंश अवतार पल रहा है तो मैं इसी क्षण उन्हें प्रकट करके अपने प्राण त्याग दूंगी | यह कहते हुए सुवर्चा ने एक नुकीले पत्थर से अपना पेट काटकर बच्चे का जन्म कराया और अपने प्राण त्याग दिये | भगवान शिव का अंश अवतार होने के कारण बालक का शरीर दिव्य तेज से जगमगा रहा था | नीले कंठ पर सर्प लिपटा था | दया का सागर आँखों में हिलोरें ले रहा था | कपूर सी गोरी व सुगन्धित काया से युक्त बालक पीपल के वृक्ष के नीचे पत्थर पर लेटा था | तभी ब्रह्मा जी सहित सभी देवता वहां आ गए और भगवान शिव के अंश अवतार के दर्शन करने लगे | तभी ब्रह्मा जी बोले कि महर्षि दधीचि के पुत्र रूद्र अवतार है और शिव की तरह ही जगत का कल्याण करेंगे | पीपल के वृक्ष के नीचे जन्म होने के कारण ब्रह्मा जी ने रूद्र अवतार का नाम पिप्लाद रखा |

आगे चल कर भगवान शिव के अंश अवतार महर्षि दधीचि के पुत्र महर्षि पिप्लाद ने कठोर तपस्या करके कई सिद्धियाँ हासिल की और शनि देव की शक्तियों पर नियन्त्रण कर लिया | उन्होंने शनि देव से दो संकल्प कराये | पहला बाल अवस्था में किसी मनुष्य को कष्ट नहीं दोगे और दूसरा कि पिप्लादी साधना करने वालों को कभी कष्ट नहीं दोगे | महर्षि पिप्लादी की कृपा से शनि देव इस प्रतिज्ञा से बंधे है | शनि का संकट दूर करने के लिए ही भगवान शंकर ने पिप्लाद के रूप में जन्म लिया था | तभी से शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष के समीप भगवान शंकर के अंश अवतार व महर्षि दधीचि के पुत्र महामुनि महर्षि पिप्लाद की साधना करने से शनि संकट रुपी सभी रोग, शोक, दीनता, दुख व दरिद्रता आदि सभी दूर होकर जीवन सफल हो जाता है |

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वेदों का नेत्र ज्योतिष

माँ सरस्वती जी की वन्दना के पश्चात्, ज्योतिष के विषय में इतना बताना चाहूँगा कि ज्योतिष शास्त्र में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है, यह विशुद्ध विज्ञान है | आज के आधुनिकतम विज्ञान का रहस्य इसके गर्भ से ही निकलता है | ज्योतिष शब्द की व्युत्पति ज्योति से हुई है | ज्योति का अर्थ है प्रकाश | जिस ज्ञान के शब्दों से प्रकाश की किरणें निकलती हों ऐसे शब्दों के सार को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है | आज से सहस्त्रो वर्ष पूर्व ‘श्री सूर्य, भृगु, अत्री कश्यप, बृहस्पति, पाराशर आदि महर्षियों ने लोक कल्याण हेतु इस विद्या को प्रकाशित एवं प्रचलित किया था |
Astrology is a science which has come down to us as a gift from Ancient Rishis.

हिन्दू धर्म में चार वेदों को मान्यता प्राप्त है – ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद जिन्हें सभी विद्याओ का मूल माना जाता है | इन्हीं वेदों में से ऋग्वेद के छठे अंग को ज्योतिष कहा गया है इसीलिए ज्योतिष को ज्योतिषामयनं चक्षुः यानि वेदों का नेत्र भी कहा गया है | जिस प्रकार नेत्रों से विभिन्न वस्तुओ की गतिविधियों को देखा जाता है, उसी प्रकार से ज्योतिष शास्त्र द्वारा भूत, भविष्य एवं वर्तमान काल में घटने वाली घटनाओं की जानकारी मिल सकती है | चन्द्रमा की शीतलता के प्रभाव से समुद्र में ज्वार भाटा आता है | सूर्य की गर्मी से कोणार्क में फसलें पकती है यह बात हम सभी जानते हैं | उसी प्रकार से सूर्य, चन्द्र व अन्य ग्रहों का पृथ्वी व पृथ्वी वासियों पर प्रभाव पड़ता है |

ज्योतिष के दो विभाग होते हैं – गणित एवं फलित | गणित द्वारा ब्रह्माण्ड में ग्रहों की स्थिति एवं फलित द्वारा ग्रहों का जीवन पर असर देखा जाता है | इन्सान का जीवन और सुख दुख, इनका आपस में अटूट रिश्ता है | इस अटूट बन्धन में ज्योतिष का अपना महत्व है यह बात भविष्य पुराण, स्कन्द पुराण, नारद संहिता, वृहद सहिंता आदि ग्रंथों से प्रमाणित होती है | मानव कर्मशील होते हुए ग्रह चाल के अनुसार चलने को विवश है | प्रारब्ध के फल सवरूप मानव को लाभ-हानि, मान-सम्मान, अच्छे बुरे फल भोगने पड़ते है | पिछले 30 वर्षो के अनुसंधान में हमने पाया कि रत्न, रुद्राक्ष एवं मन्त्रों से ग्रहों के शुभ प्रभाव को बढाया एवं अशुभ प्रभाव को कम किया जा सकता है जिससे जीवन में खुशहाली प्राप्त की जा सकती है |

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ब्रह्मूर्त में उठने के लाभ

दिन के चौबीस घन्टों में से वेदाध्ययन, योगाभ्यास, ध्यान, कुण्डलिनी जागरण, आधात्मिक क्रियाओं व् बच्चों की पढाई हेतु यह समय सबसे उपयुक्त है | रात्रि के चतुर्थ पहर में चन्द्रमा की किरणें अमृत कणों से युक्त होने के कारण पृथ्वी पर अमृत रुपी शीतलता प्रदान करती है जो शारीरिक और मानसिक बल प्रदान करती है इसलिए प्रातः 4 बजे से साढ़े पांच बजे तक के समय को अमृत बेला भी कहा गया है | वेदों के अनुसार इस समय को ही ब्रह्म मुहर्त कहा गया है और इस समय उठने वाले पुरुष महिला व बच्चों को शारीरिक व मानसिक रोग दूसरों की अपेक्षा कम पाए जाते है क्योंकि ब्रहम मुहर्त में चल रही वायु में ऑक्सिजन की मात्रा अधिक पाई जाती है | यह बात तो वैज्ञानिक भी मानते हैं |

प्रातः काल हाथ दर्शन एवं स्मरण

अमृत बेला में उठकर सर्व प्रथम अपने दोनों हाथों को सामने से देखते हुए इस श्लोक का पाठ करना चाहिए | कराग्रे वसते लक्ष्मी ; कर मध्य सरस्वती | करमूले स्थिता गौरी प्रभाते कर दर्शनम |

हाथों के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य भाग में सरस्वती, तथा मूल भाग में मणिबन्ध के पास माँ गौरी निवास करती हैं | हाथों को कर्मों का प्रतीक रूप माना गया है और कर्मों को सम्पन करने में माँ लक्ष्मी एवं माँ सरस्वती अर्थात धन एवं बुद्धि यानि ज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | ज्ञान और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए हमारे हाथों से समस्त क्रियाएँ हों यही भावना मन में धारण करके प्रात कर दर्शन का विधान तय हुआ है | इस के इलावा भाग्य को प्राप्त करने के लिए भी इन्हीं हाथों द्वारा कर्मों को करने की आवश्यकता होती है | अतः अमृत बेला में यानि प्रात उठकर कर दर्शन के पश्चात् हाथों को अपने मस्तक पर लगा कर हमें अपना दिन प्रारम्भ करना चाहिए |

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बारह मुखी रुद्राक्ष

बारह मुखी रुद्राक्ष भगवान महाविष्णु का स्वरुप माना गया है | बारह आदित्यों का तेज इस रुद्राक्ष में सम्माहित है इसलिए भगवान सूर्य देव की विशेष कृपा का भी पात्र है यह रुद्राक्ष |

बारह मुखी रुद्राक्ष के लाभ

इसको धारण करने मात्र से असाध्य व भयानक रोगों से मुक्ति मिलती है | ह्रदय रोग, उदार रोग व मस्तिष्क से सम्बन्धित रोगों में इस रुद्राक्ष को धारण करने से लाभ हो सकता है ऐसा कई ग्रन्थों में लिखा मिलता है | बारह मुखी रुद्राक्ष को कंठ में या कान के कुण्डल में धारण करने से भगवान विष्णु व सूर्य देव दोनों ही अति प्रसन्न होते हैं | इस रुद्राक्ष को द्वादश आदित्यों की कृपा प्राप्त होने से अश्वमेघ यज्ञ सहित कई यज्ञों का फल प्राप्त होता है | बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने से तन और मन स्वस्थ होते हैं और एक विशेष प्रकार की शक्ति उत्पन्न होती है | राजनीति व सरकारी क्षेत्रों में काम करने वाले जातकों के लिए बारह मुखी रुद्राक्ष अति उत्तम माना गया है | गोवध करने वाले पापी व रत्नों की चोरी करने जैसे महापाप में भी इस रुद्राक्ष के धारण करने से भगवान सूर्य की कृपा प्राप्त होती है और पापों से व्यक्ति मुक्त हो जाता है एैसा हमारे ग्रन्थों में कहा गया है | यह रुद्राक्ष क्षत्रुओं का नाश करके व्याधियों का नाश करके सूर्य आदि ग्रहों के कमज़ोर प्रभाव को नष्ट करके सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति करवाता है इसलिए इस रुद्राक्ष को सभी को धारण करना चाहिए |

बारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र

इस रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र “ॐ क्रोम श्रोम रोम नमः” है | इस मंत्र की तीन माला या “ॐ नमः शिवाय” मंत्र की पांच माला या मृत्युंजय मंत्र की एक माला नित्य प्रति करने से समस्त प्रकार के रोगों से व समस्याओं से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है और लाभान्वित हुआ जा सकता है अतः सभी को भगवान सूर्य और भगवान विष्णु के स्वरुप रूपी बारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए |

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*Descriptions for products are taken from scripture, written and oral tradition. Products are not intended to diagnose, treat, cure, or prevent any disease or condition. We make no claim of supernatural effects. All items sold as curios only.

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ग्यारह मुखी रुद्राक्ष

भगवान शंकर जिनके अक्ष की आंसू से रुद्राक्ष उत्पन्न हुआ है उन्हीं भगवान शिव के ग्यारह रुद्रों का प्रतीक है ग्यारह मुखी रुद्राक्ष | इसके धारक को भगवान शंकर की कृपा पाने के लिए सबसे उत्तम रुद्राक्ष माना गया है |

ग्यारह मुखी रुद्राक्ष के लाभ

महाशिवपुराण के अनुसार इस रुद्राक्ष को शिखा में बांधना चाहिए या गले में धारण करना चाहिए | इसको धारण करने से और इसके ऊपर मन्त्रों के जाप करने से धीरे धीरे अश्व्मेघ यज्ञ का फल भी प्राप्त हो सकता है | व्यापारियों के लिए ग्यारह मुखी रुद्राक्ष अति उत्तम फल प्रदान करने वाला माना गया है | भाग्य वृद्धि और धन सम्पत्ति व् मान सम्मान की प्राप्ति के लिए इसे अवश्य धारण करना चाहिए | साक्षात एकादस रूद्र रूप होने से यह जातक को रोग मुक्त करने में भी सहायक होता है और धार्मिक अनुष्ठान, पूजा पाठ में भी उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है | राजनीति, कूटनीति व् हर प्रकार के क्षेत्र में ग्यारह मुखी रुद्राक्ष का धारक सर्वत्र विजय होता है | यह एक सफल एवं उत्तम रुद्राक्ष माना गया है इसलिए हनुमान जी की उपासना करने वाले एवं व्यापार करने वाले हर व्यक्ति को इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिए |

ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र

इस रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र “ॐ ह्रीं हूं नमः” है | इसको धारण करने के पश्चात नित्य प्रति पांच माला “ॐ नमः शिवाय” या तीन माला ऊपर लिखे हुए मंत्र की या एक माला मृत्युंजय मंत्र की जाप करनी चाहिए ताकि भगवान शिव के ग्यारह रुद्रों सहित मर्यादा पुरषोत्तम प्रभु श्री राम जी के अनन्य भक्त श्री हनुमान जी की भी कृपा प्राप्त की जा सके | पांच मुखी रुद्राक्ष की माला में ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को सुमेरु के रूप में लगाकर धारण करना अति उत्तम कहा गया है |

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दस मुखी रुद्राक्ष

दस मुखी रुद्राक्ष साक्षात रूप से भगवान विष्णु का स्वरुप माना गया है | जन्मपत्री में कोई भी अशुभ ग्रह हो उसके प्रभाव को कम करने के लिए यह रुद्राक्ष अति उत्तम माना गया है |

दस मुखी रुद्राक्ष के लाभ

दस रुद्रों का आशीर्वाद होने के कारण से भूत प्रेत, डाकिनी शाकिनी, पिशाच व् ब्रह्म राक्षस जनित ऊपरी बाधाएं व् जादू टोने को दूर करने में सहायक होता है | क़ानूनी परेशानियों में भी दस मुखी रुद्राक्ष लाभदायक है | विष्णु जी का स्वरुप होने के कारण से धारक के प्रभाव को दसों दिशाओं में फैलता है | तंत्र मंत्र की साधना करने वाले साधकों के लिए यह रुद्राक्ष अति उत्तम माना गया है | इसको धारण करके साधना करने से सिद्धि में सहायता प्राप्त होती है | सर्प आदि के काटने के भय से बचाकर दस मुखी रुद्राक्ष पूर्ण आयु प्राप्त करवाने में सहायक सिद्ध होता है | ग्रह बाधा के कारण जिस जातक का भाग्य उदय ना हो रहा हो उसके लिए भी दस मुखी रुद्राक्ष धारण करना शुभ माना गया है | ग्रन्थों के अनुसार विष्णु जी की कृपा होने के कारण से इसके धारक को दमा, गठिया, शएतिका व् पेट और नेत्रों के रोग में लाभ हो सकता है | असाध्य रोगों से छुटकारा भी मिल सकता है ऐसा कई ग्रन्थों में वर्णित है इसलिए सभी को अपने कल्याण के लिए दस मुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन शिवलिंग से स्पर्श कराके धारण करना चाहिए |

दस मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र

इस रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र है “ॐ ह्रीं नमः” | इस रुद्राक्ष को धारण करके ऊपर लिखे मंत्र की या “ॐ नमः शिवाय” की पांच माला जाप करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है |

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नौ मुखी रुद्राक्ष

महाशिवपुराण के अनुसार नौ मुखी रुद्राक्ष माँ भगवती की नौ शक्तियों का प्रतीक माना गया है | कपिलमुनि और भैरोदेव की कृपा भी इस रुद्राक्ष पर मानी गई है |

नौ मुखी रुद्राक्ष के लाभ

इसको धारण करने से धन सम्पत्ति, मान सम्मान, यश, कीर्ति और सभी प्रकार के सुखों की वृद्धि होती है | इस रुद्राक्ष को बाए हाथ में या कंठ में धारण करना चाहिए | यह रुद्राक्ष आखों की दृष्टि के लिए भी उपयोगी माना गया है | माँ भगवती की असीम अनुकम्पा नौ मुखी रुद्राक्ष पर होने से यह कवच का काम करता है और शरीर को मानसिक एवं भौतिक दुखों से बचाता है और धारक की कीर्ति सर्वत्र फैलाता है | नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करने से धीरे धीरे मन शांत हो जाता है और लोगों के कल्याण की कामना करने लगता है | महाशिवपुराण के अनुसार देवी दुर्गा का स्वरुप होने के कारण से विशेष कर महिलाओं के लिए यह रुद्राक्ष अत्यंत उपयोगी है | इसके धारण से इच्छा शक्ति प्रबल होकर कई पापों का नाश होता है | देवी माँ की कृपा इस रुद्राक्ष पर होने से सभी देवताओं की कृपा भी इस रुद्राक्ष के धारक को मिलती है अतः हर पुरुष व् महिला को जो किसी भी रूप में देवी का पूजन करता हो उसे नौ मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए | इसके धारण से मानसिक रोग व् ह्रदय रोग में भी लाभ हो सकता है | इस रुद्राक्ष पर केतु का प्रभाव भी माना गया है | केतु ग्रह का नाम अचानक और अजीब सा फल देने के बारे में जाना जाता है इसलिए इस रुद्राक्ष के धारक को अचानक कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं |

नौ मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र

इस रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र है “ॐ ह्रीं हूँ नमः” | देवी की उपासना करने वाले सभी जातकों को नौ मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए |

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आठ मुखी रुद्राक्ष

भगवान शिव एवं माँ पारवती के प्रिय पुत्र विघनहारक भगवान गणेश जी आठ मुखी रुद्राक्ष के प्रधानदेवता माने गए हैं | आठ मुखी रुद्राक्ष भैरोदेव का स्वरुप माना गया है |

आठ मुखी रुद्राक्ष के लाभ

यह रुद्राक्ष के धारण करने से उच्च पद की प्राप्ति व् मन की एकाग्रता में सुधार होता है | यह रुद्राक्ष ऋद्धि सिद्धि दायक है | जीवन में जितनी भी मुश्किलें और विघन होते हैं उनको दूर करने में आठ मुखी रुद्राक्ष सहायक सिद्ध होता है | जिस प्रकार शास्त्र अनुसार सर्वप्रथम श्री गणेश भगवान की पूजा की जाती है उसी प्रकार इस रुद्राक्ष को भी निसंकोच व् बिना किसी जानकारी के भी धारण कर लेना चाहिए क्योंकि महाशिवपुराण के अनुसार आठ मुखी रुद्राक्ष बुद्धि, ज्ञान, धन, यश और उच्च पद की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है | जो व्यापारी किसी भी प्रकार से नापतोल में बईमानी करते हैं शास्त्रानुसार वह व्यापारी पाप के भागी बनते हैं और जो व्यक्ति अपने जीवन में पर इस्त्री के संपर्क में रहते हैं वह भी पाप के भागी होते हैं | ग्रंथों के अनुसार एैसे पापियों को भी आठ मुखी रुद्राक्ष के धारण करने से पाप मुक्त होने में सहायता मिलती है | एैसा माना गया है की यह दोनों रुद्राक्षों को धारण करने वाले जातक को मृत्योपरांत शिवलोक की प्राप्ति होती है |

आठ मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र

इसको धारण करने का मंत्र भी “ॐ हूँ नमः” है | जैसा की सात मुखी के विवरण में हमने लिखा है कि आठ मुखी के साथ धारण करना चाहिए उसी प्रकार इस रुद्राक्ष को भी सात मुखी के साथ धारण करना चाहिए क्योंकि माँ लक्ष्मी और गणेश भगवान जी की पूजा साथ में करने का विधान है |

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